28 जुलाई 1987 की रात। दिल्ली के 7 रेसकोर्स रोड यानी प्रधानमंत्री आवास में एक मीटिंग हुई। तब के PM राजीव गांधी के सामने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम यानी LTTE के मुखिया प्रभाकरन और उनके साथी बालासिंघम बैठे थे।
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श्रीलंका उन दिनों गृहयुद्ध की चपेट में था, जिसके एक ग्रुप का लीडर प्रभाकरन था। भारत अपने पड़ोसी देश में शांति बहाल करना चाहता था। इसलिए राजीव ने IFS अधिकारी हरदीप पुरी को दो हेलिकॉप्टर के साथ भेजकर जाफना से प्रभाकरन को बुलवाया था।
PM आवास में करीब डेढ़ घंटे की मीटिंग हुई। प्रभाकरन ने शर्तों पर हामी भर दी, लेकिन किसी कागज पर दस्तखत नहीं किए।
प्रधानमंत्री ऑफिस में जॉइंट सेक्रेटरी रहे मणिशंकर अय्यर के मुताबिक, जब प्रभाकरन जाने के लिए खड़ा हुआ तो राजीव गांधी ने बेटे राहुल को बुलाकर अपनी बुलेटप्रुफ जैकेट मंगवाई। राजीव ने वो जैकेट प्रभाकरन की पीठ पर डालते हुए कहा, ‘अपना ख्याल रखिएगा।’ इस वाकये के 4 साल बाद प्रभाकरन ने राजीव गांधी की हत्या करवा दी।
आज PM मोदी श्रीलंका के 3 दिन के दौरे पर जा रहे हैं; इस स्टोरी में जानेंगे कि कैसे 4 दशक पुराने एक फैसले ने श्रीलंका को भारत से दूर और चीन के करीब पहुंचा दिया…

28 जुलाई 1987 को PM आवास पर राजीव गांधी ने प्रभाकरन से मुलाकात की थी।
भारत-श्रीलंका के बीच हुए समझौते से नाराज था प्रभाकरन
1970-1980 के दौर में श्रीलंका में जारी गृहयुद्ध की जड़ों में सिंघली और तमिल कम्युनिटी के बीच का झगड़ा था। लंबे वक्त से श्रीलंका के तमिल अल्पसंख्यक अलग देश और अधिकारों की मांग कर रहे थे। इसकी अगुआई LTTE कर रहा था। शुरुआत में इस आंदोलन को भारत सरकार भी साथ मिला।
इससे जुड़ा एक वाकया भी है।
4 जून 1987 को सुबह के 8 बजे। भारतीय वायुसेना के पांच AN-32 मालवाहक विमानों ने आगरा एयरबेस से बैंगलोर के लिए उड़ान भरी। उनके साथ 6 मिराज-2000 युद्धक विमान भी थे। वायुसेना ‘ऑपरेशन पूमलाई’ करने वाली थी।
शाम 3 बजे भारत के विदेश मंत्री नटवर सिंह ने दिल्ली में श्रीलंका के राजदूत को तलब करके चेतावनी दी कि हमारे विमान शाम 4 बजे जाफना के लोगों के लिए खाने-पीने के सामान के साथ कपड़े, टेंट और दवाएं गिराएंगे। अगर श्रीलंकाई सेना ने इन्हें रोकने की कोशिश की तो हम पूरी ताकत से जवाब देंगे।
इसके बाद तय वक्त पर पांचों विमान ने जाफना पर राहत सामग्री गिराई। श्रीलंकाई सेना चुपचाप बैठी रही। दरअसल, उस वक्त श्रीलंकाई सेना ने तमिलों के गढ़ जाफना को घेर लिया था।
इसके बाद श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति जेआर जयवर्धने ने देश में शांति बहाली के लिए भारत के साथ समझौता करने का फैसला किया। तब के भारत के प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी तैयार हो गए। इसके लिए राजीव ने दिल्ली में प्रभाकरन से मुलाकात की।
‘द रूट ऑफ प्रभाकरन’ के लेखक और सीनियर जर्नलिस्ट एमआर नारायणस्वामी के मुताबिक,

प्रभाकरन के साथ मुलाकात से राजीव गांधी काफी खुश थे। प्रभारन ने उन्हें शांति बहाली के लिए अश्वासन दिया। बालासिंघम ने मुझे बताया कि हमने प्रस्ताव को माना है, लेकिन मुझे लगता है कि वो दिल से इसके लिए तैयार नहीं थे।
प्रभाकरन से मुलाकात के अगले ही दिन यानी 29 जुलाई 1987 को राजीव अपने अधिकारियों के साथ श्रीलंका के लिए रवाना हो गए। इसी दिन उन्होंने जयवर्धने से मुलाकात की और भारत-श्रीलंका पीस अकॉर्ड पर दस्तखत किए।

29 जुलाई 1987 को भारत-श्रीलंका पीस अकॉर्ड पर दस्तखत करते हुए भारत के PM राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा।
समझौते के तहत श्रीलंका में शांति बहाल करने और तमिल रिबेल गुटों से हथियार डलवाने के लिए भारतीय सेना की तैनाती की गई, जिसका नाम इंडियन पीस कीपिंग फोर्स यानी IPKF रखा। LTTE इसके लिए राजी नहीं हुआ।
धीरे-धीरे ‘श्रीलंकाई सेना वर्सेज LTTE’ की ये जंग ‘IPKF वर्सेज LTTE’ की जंग में बदल गई। 32 महीनों में IPKF के 1,166 जवान शहीद और करीब 3,500 जवान घायल हुए। वहीं LTTE ने भी भारी नुकसान उठाया।
LTTE चीफ प्रभाकरन का मानना था कि इस समझौते के बाद उसे ईलम मिलेगा यानी अलग तमिल देश बनेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसे लगता था कि राजीव गांधी और भारत सरकार ने उसे धोखा दिया है।
भड़के प्रभाकरन ने राजीव की हत्या का फैसला लिया
सीनियर जर्नलिस्ट नारायणस्वामी अपनी किताब ‘द रूट ऑफ प्रभाकरन’ में लिखते हैं, ‘राजीव गांधी के कैबिनेट के एक मंत्री का मानना था कि प्रभाकरन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। उन्होंने राजीव को सुझाव दिया था कि जब तक LTTE अपने हथियार न डाल दे, तब तक क्यों न प्रभाकरन को भारत में रखा जाए? राजीव ने इससे इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रभाकरन ने मुझे जुबान दी है। मुझे उन पर भरोसा है।’
हालांकि, प्रभाकरन ने ये वादा कभी पूरा नहीं किया और राजीव गांधी से बदला लेने का मन बना लिया। इसी बीच 1989 में भारत में आम चुनाव हुए। बोफोर्स के मुद्दे पर राजीव चुनाव हार गए। BJP के समर्थन से जनता दल की सरकार बनी और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। 1990 में वीपी सिंह ने श्रीलंका से IPKF को वापस बुला लिया। अक्टूबर 1990 में BJP ने सरकार से हाथ खींच लिया।
इसके बाद कांग्रेस के समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने, लेकिन अल्पमत की सरकार होने के कारण मई 1991 में आम चुनावों की सुगबुगाहट होने लगी। तब माना जा रहा था कि राजीव गांधी ही सत्ता में आएंगे। इस आहट ने LTTE चीफ प्रभाकरण को डरा दिया। उसे लगा कि राजीव की वापसी, श्रीलंका में भारतीय सेना की वापसी होगी।
सीनियर जर्नलिस्ट अनिरुद्ध मित्रा ने अपनी किताब ‘नाइंटी डेज: द ट्रू स्टोरी ऑफ द हंट फॉर राजीव गांधीज असैसिंस’ में लिखा है, ‘वीपी सिंह सरकार गिरने से पहले ही LTTE ने ये मन बना लिया था कि राजीव को सत्ता में लौटने से रोकना है। इसके लिए भले ही राजीव की हत्या ही करनी पड़े।’
दरअसल, प्रभाकरन चाहता था कि राजीव को चुनाव से पहले मार दिया जाए, क्योंकि अभी उनके पास कम सिक्योरिटी है और वो कमजोर हैं। उसे लगता था कि उस पर या LTTE पर राजीव गांधी की हत्या का आरोप नहीं लगेगा।
सीनियर जर्नलिस्ट नीना गोपाल अपनी किताब ‘द असैसिनेशन ऑफ राजीव गांधी’ में लिखती हैं, ‘राजीव की हत्या को LTTE ने ‘ऑपरेशन वेडिंग’ नाम दिया था। LTTE चीफ वेलुपिल्लई प्रभाकरण ने नवंबर 1990 में राजीव की हत्या की योजना बनाई।’
प्रभाकरन और LTTE के इंटेलिजेंस चीफ षनमुगलिंगम शिवशंकर ने तीन महिला सुसाइड बॉम्बर्स को चुना। ये तीनों LTTE के ब्लैक टाइगर सुसाइड स्क्वाड में थीं। प्रभाकरन ने राजीव गांधी की हत्या की प्लानिंग बनाने का जिम्मा शिवरासन को सौंपा।

प्रभाकरन के पास आर्म्ड फोर्स थी, जिसमें कमांडो, शूटर्स, सुसाइड बॉम्बर्स, आदि शामिल थे। LTTE का हर मेंबर अपने गले में सायनाइड का कैप्सूल पहनता था और खतरे के हालात में उसे खाकर जान दे देता था।
चंदन का हार पहनाया, पैर छुए और फिर धमाका किया
21 मई 1991 की रात। तमिलनाडु की राजधानी मद्रास (अब चेन्नई) से 40 किमी दूर मौजूद श्रीपेरंबदूर में कांग्रेस की एक रैली हो रही थी। यहां हजारों की संख्या में लोग राजीव गांधी का इंतजार कर रहे थे।
रात करीब 10 बजकर 10 मिनट पर राजीव गांधी श्रीपेरंबदूर पहुंचे। पुरुष समर्थकों से मिलने के बाद राजीव ने महिलाओं की ओर बढ़े। वहां 30 साल की कम कद और गहरे रंग की एक लड़की भी खड़ी हुई थी। उसके हाथों में चंदन का हार और आंखों पर बड़ा सा चश्मा था।
‘द असैसिनेशन ऑफ राजीव गांधी’ के मुताबिक, ‘तमिलनाडु पुलिस की महिला दरोगा अनुसुइया को रैली के मंच के सामने यानी D एरिया की सुरक्षा की जिम्मेदारी मिली थी। वहां VIP पास लिए कुछ लोग खड़े थे। वहां चंदन का हार लिए खड़ी एक लड़की को देखकर अनुसुइया को अजीब लगा तो उन्होंने उसे पीछे धकेल दिया। राजीव के आने पर वो लड़की फिर से आगे आ गई। अनुसुइया ने उसका हाथ पकड़ लिया, लेकिन तभी राजीव की आवाज आई, ‘चिंता मत कीजिए, सबको आने दीजिए’ और अनुसुइया के हाथों की पकड़ ढीली पड़ गई।’
कुछ ही देर बाद वो लड़की राजीव के पास पहुंची। राजीव को उसने चंदन का हार पहनाया और उनके पैर छूने के लिए झुकी। तभी उसने अपने कपड़ों के अंदर पहनी हुई बम वाली बेल्ट का बटन दबा दिया। तेज धमाके के साथ चारों तरफ खून बिखर गया। उस वक्त मंच पर एक गीत गाया जा रहा था,
राजीव का जीवन हमारा जीवन है… अगर वो जीवन इंदिरा गांधी के बेटे को समर्पित नहीं है… तो वो जीवन क्या?
धमाका करने वाली वो लड़की LTTE की सुसाइड बॉम्बर धनु थी। उसने राजीव के पास पहुंचकर खुद को बम से उड़ा लिया था। इस धमाके में 47 साल के राजीव गांधी की मौत हो गई। धनु भी मारी गई। कुल 14 लोगों की मौत हो गई।

21 मई 1991 को श्रीपेंरबदूर में धमाके से कुछ मिनट पहले लोगों से मिलते हुए राजीव गांधी की तस्वीर।
धनु ने राजीव को मारने से पहले दो बार हमले की रिहर्सल की थी। पहली बार उसने AIADMK की दिवंगत नेता जयललिता की एक रैली में इसकी प्रैक्टिस की। दूसरी रिहर्सल उसने राजीव की हत्या से 9 दिन पहले तमिलनाडु में ही पूर्व PM वीपी सिंह और DMK नेता करुणानिधि की एक रैली में की थी।
धनु ने इस रैली में वीपी सिंह के पैर छुए थे। धनु रिहर्सल से ये देखना चाहती थी कि क्या बड़े नेता के मंच के पास, यानी हाई सिक्योरिटी वाले D एरिया में उनके पैर छुए जा सकते हैं। क्योंकि पैर छूने के दौरान नेता को हार पहनाने और धमाका करने का प्लान था।
राजीव गांधी की बायोग्राफी ‘राजीव गांधी: एंड ऑफ ए ड्रीम’ में सीनियर जर्नलिस्ट मिन्हाज मर्चेंट लिखते हैं, राजीव की हत्या करने वाले LTTE के कोर ग्रुप में आठ कोर मेंबर थे, जिसमें धनु, शिवरासन, मुरुगन, अरिवु, शुभा और तीन स्थानीय लोग भाग्यनाथन, नलिनी और पद्मा शामिल थे। इनके साथ एक फोटोग्राफर भी था।

21 मई 1991 को राजीव की हत्या से पहले की ये तस्वीर हैं। इसमें माला लिए खड़ी धनु, कांग्रेस कार्यकर्ता लता कन्नन और उनकी बेटी कोकिला के बीच में खड़ी नजर आ रही हैं। सफेद कुर्ता पहना व्यक्ति शिवरासन है। ये तस्वीर LTTE के फोटोग्राफर हरिबाबू ने खींची थी, जो धमाके में मारा गया।
राजीव की हत्या के बाद भारत-श्रीलंका के रिश्तों में पड़ी दरार
राजीव गांधी की हत्या के बाद ने न केवर भारत को झकझोर दिया, बल्कि भारत-श्रीलंका के रिश्ते और देश की आंतरिक सुरक्षा को नया मोड़ दिया। भारत सरकार ने हत्या की जांच करने के लिए सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन यानी CBI ने एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) बनाई, जिसकी कमान CRPF के IG डी. आर. कार्तिकेयन को सौंपी गई। टीम ने तेजी से काम कर साबित कर दिया कि राजीव की हत्या में LTTE का हाथ था।
14 मई 1992 को भारत सरकार ने LTTE को गैर-कानूनी संगठन करार दिया। उसकी हर एक्टिविटी और फंडिंग पर रोक लगा दी। दुनिया के अन्य देशों ने भी LTTE को आतंकी संगठन बताते हुए बैन कर दिया।
इसके अलावा रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) और इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) ने तमिलनाडु में LTTE समर्थकों नकेल कसी और उसका नेटवर्क खत्म किया। भारत ने श्रीलंका सरकार पर LTTE के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का दबाव डाला। तब श्रीलंका के राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा थे।
वहीं भारत ने श्रीलंका से किनारा कर लिया और मिलिट्री सपोर्ट देने से मना कर दिया। इंडियन नेवी और कोस्ट गार्ड्स ने श्रीलंका की समुद्री सीमा पर तैनाती और गश्त बढ़ा दी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर श्रीलंका पर दबाव बना। भारत ने श्रीलंका साथ आर्थिक संबंध सीमित कर दिए, हालांकि पूरी तरह से बैन नहीं लगाया। 1990 के दशक में दोनों देशों के बीच ट्रेड और इन्वेस्टमेंट में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हुई।
राजीव गांधी की हत्या के बाद भारत ने LTTE के लिए सख्त रवैया अख्तियार किया, लेकिन श्रीलंका ने भी बेरुखी दिखाई…
1. आरोपियों के प्रत्यर्पण से इनकार: CBI की गुजारिश पर INTERPOL ने हत्या के आरोपियों के खिलाफ डिफ्यूजन और रेड नोटिस जारी किया। 1995 में केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने संसद में कहा कि ‘श्रीलंकाई अधिकारियों ने SIT को बताया कि फरार आरोपी जाफना में थे, जहां कोई नागरिक प्रशासन नहीं था और कोई पूछताछ नहीं की जा सकती थी।’
भारत में प्रभाकरन के प्रत्यर्पण को लेकर बहस जारी थी। हत्या के तीन महीने बाद जनता पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने श्रीलंका से कहा कि अगर वो प्रभाकरन को पकड़ने में असमर्थ हैं तो वो भारतीय कमांडो को इजाजत दें। संसद में सरकार ने प्रभाकरन के प्रत्यर्पण की बात कही, लेकिन श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा ने इससे इनकार कर दिया।
2. LTTE के साथ दिखी श्रीलंकाई सरकारें: राजीव गांधी की हत्या के बाद जब भारत ने श्रीलंका पर दबाव बनाया, तो श्रीलंकाई सरकारें LTTE और प्रभाकरन के साथ नजर आने लगीं। अप्रैल 1992 में राष्ट्रपति प्रेमदासा ने कोलंबो में एक रैली में कहा, ‘सिर्फ इसलिए कि ‘छोटे भाइयों’ ने कभी-कभी गलती की, तो उन्हें आज्ञाकारी बनाने के लिए पड़ोसी को सौंप दें, ‘बड़े भाई’ ऐसा नहीं करेंगे।’ ऐसा बयान देकर प्रेमदासा ने भारत को प्रभाकरन को सौंपने से इनकार कर दिया।
प्रेमदासा की हत्या के बाद चंद्रिका भंडारनायके कुमारतुंग श्रीलंका की नई राष्ट्रपति बनीं। वो भी LTTE का समर्थन करती नजर आईं। दिसंबर 1994 में एक इंटरव्यू में चंद्रिका ने कहा, ‘हमारा प्रभाकरन को पकड़ने और उसे हमेशा के लिए जेल में डालने का कोई इरादा नहीं है। अगर ऐसा होता, तो दुनिया में कहीं भी शांति संभव नहीं होती।’ हालांकि, कुछ समय के बाद चंद्रिका ने प्रभाकरन को राजीव गांधी की हत्या का दोषी ठहराया और उससे किनारा कर लिया।
3. श्रीलंका ने चीन से नजदीकियां बढ़ाईं: 1990 के दशक में मानवाधिकार के उल्लंघन का हवाला देते हुए जब अमेरिका, यूरोपीय देशों ने श्रीलंका को हथियार और फंड देने से मना कर दिया, तब चीन आगे आया। चीन ने श्रीलंका फंड और सस्ते हथियार दिए। श्रीलंका और चीन के बीच बढ़ती नजदीकियां भारत के लिए चिंताजनक थीं।
एमिटी यूनिवर्सिटी में फॉरेन स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. श्रीश कुमार पाठक बताते हैं, ‘भारत-श्रीलंका संबंध पहले जैसे नहीं थे। ऐसे में चीन और श्रीलंका करीब आएं, खासकर 2000 के दशक में हुए ईलम वॉर-4 के दौरान। चीन ने मिलिट्री और फंड मुहैया कराया। चीन ने निवेश किया और प्रोजेक्ट्स शुरू किए। यही आगे चलकर हंबनटोटा पोर्ट डील की वजह बने। 2017 में चीन ने इस पोर्ट को 99 साल की लीज पर ले लिया।’
4. श्रीलंका में 13वां संशोधन लागू करने में ढिलाई: 1987 में राजीव गांधी और प्रेमदासा ने समझौते पर दस्तखत करते हुए श्रीलंका में 13वां संशोधन लागू करने की बात कही थी, लेकिन इसमें श्रीलंकाई सरकारों ने ढिलाई की। इस संशोधन में कृषि, स्वास्थ्य जैसे मुद्दे 9 प्रांतों की सौंपना, सिंघली के साथ तमिल और अंग्रेजी को आधिकारिक भाषा बनाना जैसी बातें शामिल थीं।
राजीव गांधी की हत्या के बाद भारत ने इस मांग को और जोर-शोर से उठाया, लेकिन श्रीलंका ने नजरअंदाज किया। जुलाई 2023 में जब श्रीलंकाई राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे भारत आए, तो PM नरेंद्र मोदी ने उनसे श्रीलंका में 13वां संशोधन लागू करने की बात कही।

जुलाई 2023 में श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे भारत आए थे, तब उन्होंने PM नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी।
प्रभाकरन की मौत के बाद और मोदी सरकार के दौरान सुधरे हालात
18 मई 2009 को प्रभाकरन की मौत के साथ LTTE का खत्म हो गया। इसके बाद श्रीलंका ने अपने देश और विदेश नीति पर फोकस किया। भारत ने भी श्रीलंका के डेवलपमेंट के लिए फाइनेंशियल सपोर्ट दिया। हालांकि, तमिलों के अधिकारों और मानवाधिकार उल्लंघन पर भारत का दबाव बना रहा।
2014 में नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत की विदेश नीति मजबूत करने पर फोकस किया। उन्होंने पड़ोसी देशों से दोस्ती का हाथ बढ़ाया। श्रीलंकाई सरकारों ने भी इसे अपनाया। हालांकि चीन का प्रभाव बढ़ता रहा।
2022 में जब श्रीलंका में आर्थिक संकट आया, तो भारत आगे आया। भारत ने करीब 4 बिलियन डॉलर की मदद की। भारत ने इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) से श्रीलंका को लोन दिलवाने में भी अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा भारत वहां निवेश कर रहा है और प्रोजेक्ट्स चला रहा है।
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कच्चाथीवू पर भारत के मछुआरे जाल सुखाते थे: इंदिरा गांधी ने इसे श्रीलंका को क्यों दिया; PM मोदी हुए हमलावर

‘इंदिरा गांधी ने 1974 में भारत के रामेश्वरम के पास मौजूद कच्चाथीवू द्वीप श्रीलंका को गिफ्ट कर दिया था। हर भारतीय इससे नाराज है और यह तय हो गया है कि कांग्रेस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।’ पीएम नरेंद्र मोदी ने एक RTI रिपोर्ट का हवाला देते हुए कांग्रेस पर हमला बोला। पूरी खबर पढ़े…
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